दो मिनिट की चाहत…

इम्तिहान का समय, आंखरी कुछ पंक्तियाँ,
कागज़ खत्म हो जायेंगे,
पर दो मिनिट की चाहत,
कभी खत्म नहीं होगी
* * *
सुबह का वक़्त, घडी की ललकार,
जगाने की कोशिशें थक जाएगी,
पर दो मिनिट की चाहत,
कभी खत्म नहीं होगी
* * *
किताब के आंखरी पन्ने, कुछ खुलते हुए राज़,
दफ्तर को भले ही देर हो जायेगी,
पर दो मिनिट की चाहत,
कभी खत्म नहीं होगी
* * *
दोस्तोंके साथ खेलना, शाम का ढलता सूरज,
माँ की आवाज अनसुनी हो जाएगी,
पर दो मिनिट की चाहत,
कभी खत्म नहीं होगी
* * *
 — @pbkulkarni
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बाग़-ए-ग़ुलाब…

धीरे से जाना उस बाग़ में,
जहा गुलाब खिलता हो,
खुशबू के संग संग कांटोंको,
जहा आझमाने मिलता हो
* * *
कभी ग़म के साये मिलेंगे,
कभी खुशियोंकी बारात बारात मिलेगी,
शायद खाली हाथ घूमना पड़े,
पर तकदीर से मुलाक़ात भी होगी
* * *
कुछ अलग फूल भी मिलेंगे,
उनसे भी गुफ़्तगूं कर लेना,
शायद गुलाब सी ख़ुशबू ना मिले,
पर उनको भी अपना लेना
* * *
कई रास्ते होंगे बाग़में जाने के,
पर अकेलेपन का रास्ता चुन लेना,
अगर ख़ुशबू साथ आये तो ठीक,
वरना खुद ही खुद के साथ चल देना
* * *
 — @pbkulkarni

मेरा साहिल भी तू और भँवर भी…

संभाला था खुद को बोहोत,
इस भँवर से दूर रखा था,
पर एक नाज़ुक मोड़ पर,
अनजाने में खुद को खो बैठा
* * *
जान लगा दी थी दांव पर अपनी,
खिलाफ जो थे उनको भी मनाया,
मन से अपनाया किसीको,
पर हाथ में बेगानापन आया
* * *
इतना डूबता गया मैं के उसकी,
गैरत भी समझ न पाया,
जब पता चला, पानी सर के ऊपर था,
किनारा दूर, और खुद को अकेला पाया
* * *
— @pbkulkarni (c)

एक साठवण… #Marathi #Poem

मोडक्या भिंतींच्या आडून,
काही स्वप्ने डोकावून पहात आहेत,
कधी काळचा चिरेबंदी वाडा,
आता फक्त भग्न अवशेष आहेत

* * *

उध्वस्त खिडक्यांच्या चौकटीतून,
काही सूर दरवळत आहेत,
पूर्वी सोनेरी कवडसे यायचे,
आता भकास ऊन भेडसावत आहे

* * *

भेगाळलेल्या भुईवर कधी,
पुसटसे पावलांचे ठसे दिसतात,
एकेकाळी इथे संगमरवरी नक्षी हसायची,
आता फारश्यांच्या ठीकार्‍या वावरतात

* * *

परसातल्या बागेत अधूनमधून,
अंकूर डोक वर काढताना दिसतात,
पूर्वी फळा फुलांचा सडा पडायचा इथे,
आता चुरगाळलेली फुल पसरलेली दिसतात

— @pbkulkarni