मेरा साहिल भी तू और भँवर भी…


संभाला था खुद को बोहोत,
इस भँवर से दूर रखा था,
पर एक नाज़ुक मोड़ पर,
अनजाने में खुद को खो बैठा
* * *
जान लगा दी थी दांव पर अपनी,
खिलाफ जो थे उनको भी मनाया,
मन से अपनाया किसीको,
पर हाथ में बेगानापन आया
* * *
इतना डूबता गया मैं के उसकी,
गैरत भी समझ न पाया,
जब पता चला, पानी सर के ऊपर था,
किनारा दूर, और खुद को अकेला पाया
* * *
— @pbkulkarni (c)

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