बाग़-ए-ग़ुलाब…


धीरे से जाना उस बाग़ में,
जहा गुलाब खिलता हो,
खुशबू के संग संग कांटोंको,
जहा आझमाने मिलता हो
* * *
कभी ग़म के साये मिलेंगे,
कभी खुशियोंकी बारात बारात मिलेगी,
शायद खाली हाथ घूमना पड़े,
पर तकदीर से मुलाक़ात भी होगी
* * *
कुछ अलग फूल भी मिलेंगे,
उनसे भी गुफ़्तगूं कर लेना,
शायद गुलाब सी ख़ुशबू ना मिले,
पर उनको भी अपना लेना
* * *
कई रास्ते होंगे बाग़में जाने के,
पर अकेलेपन का रास्ता चुन लेना,
अगर ख़ुशबू साथ आये तो ठीक,
वरना खुद ही खुद के साथ चल देना
* * *
 — @pbkulkarni

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