कुछ लम्हें बस…

कभी वक़्त फिसल जाता है,
रेत की तरह,
तो कभी लम्हें जलते है,
जुगनूओंकी तरह,
चाहतें बस उड़ जाती है,
हवाओंकी तरह,
पर तुमसे की हुई मोहोब्बत,
बरक़रार रहेगी हमेशा.
* * * * *
बहोत कुछ माँगा नहीं था,
तुम्हारे सिवा तुमसे,
खुद को तुझमें पाया जब,
झाँका मैंने खुद में,
ख्वाबोंका सिलसिलासा बन गया,
तेरे और मेरे बीच,
रेशमी धागा खींचता गया,
इन दूरियोंकी बीच.
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कल का सूरज…

सब्र करेंगे  रातभर, ये अंधेरा ढलनेका,
कल का सूरज क्या लाएगा, किसे है पता?
* * *
क्या होगी धूप कल, या छाँव में दिन गुजरेगा,
कल का दिन क्या दिखायेगा, किसे है पता?
* * *
रास्ता होगा ख़त्म, या चलती जाएँगी राहें,
राही बननेका दर्द है या ख़ुशी, किसे है पता?
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सब्र करेंगे दिनभर, फिर सूरज ढलनेका,
ये रातें क्या ख्वाब लाएगी, किसे है पता?
* * *
सुहाने होंगे सपने, या फिरसे दूरियां दिखेगी,
किस कश्मकश से गुजरेंगे, किसे है पता?
* * *
चाहतें होगी पूरी, या तक़दीर फिर से नचाएगी,
ज़िंदगी क्या क्या दिखाएगी, किसे है पता?
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— @pbkulkarni