ऐ दिल-ए-नादान…

ऐ दिल-ए-नादान,
क्यूँ तू इतना खुराफाती है?
अभी अभी बिखरे तुकडे सँवारे है,
और अभी फिर से बिखर रहा है?

क्यूँ तू उस गली जाता है,
जहा तेरा इंतज़ार भी नहीं होता,
जाने पहचाने रास्तों में भी,
क्यूँ है तू अंजानो की तरह खोता?

क्यूँ तेरी दिमाग से दुश्मनी है?
प्यार में क्यूँ तू इतना हावी है?
वोह हर वक़्त तुझे मना करता है,
और तू हर वक़्त उसे मनाता है

ऐ दिल-ए-नादान,
क्यूँ तू इतना खुराफाती है?
अब फिर से बिखरे है तुकडे,
चल उनको फिर से संवारना है.

 

— प्रसाद

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