सूरज या चाँद…

फिर फंस गया हु मैं उसी पशोपेश में
चाँद सूरज, सूरज चाँद
किसको ताज दूँ इस सृष्टि का

लोग कहते है चाँद देखने के लिए,
सूरज का ढल जाना ज़रूरी है,
पर सच तो यह है की सूरज से तो चाँद है
सूरज ना होता तो चाँद का वजूद क्या.

यूँ तो चाँद के कारनामे भी कम नही,
बच्चों का प्यारा, आशिक के आखों का तारा – चाँद
पर अंधेरे के बाद सवेरा दिखाता है सूरज,
हर छुपे कोने से अंधकार मिटाता है सूरज.

झिलमिलते तारों का सरताज है चाँद,
रातों का नूर और मुमताज़ चाँद
पर सूरज न होता तो फसलें न पकती
सूरज ना होता, तो रोशनी ना होती,

पर फिर वो कहते है न
कि चाँद ना होता तो आशिक़ी ना होती,

फिर फंस गया हु मैं उसी पशोपेश में
पत्तोँ के हरे होने का राज़ सूरज है,
रोमांच ताज़ा होने का राज़ चाँद है,

* * * * *
Thanks to Anuradha Sharma a.k.a. @sai_ki_bitiya for making the poem more beautiful. I wrote a raw poem and she moulded the poem into a masterpiece 🙂
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